दीवार पर लगा दर्पण,
दर्पण के सामने बैठी वह चिड़िया,
जो बार-बार देख कर,
अपना प्रतिबिंब दर्पण में,
चोट मार रही है,
उस पर अनवरत I
लगता है उस नासमझ को,
सामने बैठी है कोई दूसरी चिड़िया,
पर अपनी नासमझी में भी,
वह तो मुझे कुछ सिखा रही है I
शायद अपने आप को मारना,
आत्म चिंतन करना,
क्योंकि आज तक देखकर,
चेहरा अपना दर्पण में,
मैं सदा ही मुस्कुराया हूँI
दीपक जुनेजा
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