Sunday, 6 June 2021

#15 आखिर मुझे ही क्यों?

 तुम मुझे ही क्यों पुकारते हो,

 बार-बार किसी कार्य के निमित्त,

 और कभी-कभी तो बिना काम ही, 

 आखिर मुझे ही क्यों ?

 बाल मैं  खुले रखूं या बंधे,

 तुम कौन हो मुझे टोकने वाले,

 दूसरे भी तो है मेरे आस-पास, 

उनका तो ख्याल तक नहीं आता तुम्हें,

पूछ्ती है  यह सवाल, 

वो  लड़की मुझसे बार-बार,

 कैसे बताऊं उस नादान को, 

कि मेरे मानसिक पटल पर छाया रहता है, 

हर वक्त उसी का मनमोहक चेहरा, 

उसी की बातें  उसी का नाम, 

तो क्यों ना बुलाऊँ,

 मैं उसे बार-बार, 

और ये सब तो बहाने हैं, 

अपना प्यार जताने के, 

 इस उम्मीद में कि,  

शायद वह कुछ समझ जाए,

 और ये स्वप्न और भावनाएं, 

 बदल जाए एक प्यारी सी हकीकत में I

                                                      दीपक जुनेजा 

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