शहर से गांव की ओर
मैले कुचैले,डरे डरे से,
भुखमरी के गर्म थपेड़ों के साथI
कभी खुद लुढ़कते,
कभी अटक जाते,
किसी चलते वाहन की ट्रॉली परI
तो कभी उसी वाहन तले कुचल दिए जाते,
जलते सूरज ने इन्हें तपा डाला,
तो कहीं लालची चूहों ने कुतर डालाI
शहरी शेरवानी ने छोड़ दिया साथ इनका,
अब जरूरत ना रही इनकी,
सो उड़ चले इस सोच के साथ,
कि जैसे तैसे गांव पहुंचकर,
वो चिपक जाएंगे,
अपने ही घर के,
पुराने फटे शर्ट में किसी पैबंद की तरहI
दीपक जुनेजा
#Photo courtesy internet

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