वह बेचारा कभी,
जोरों से बालों को कचोटता I
कभी बनाकर मुट्ठी,
सिर पर जोरों से ठोकता I
कभी बनाकर एक अजीब सी मुख मुद्रा,
उसी मुख मुद्रा में आंखों से आंसू टपकाता I
कभी वह अभागा,
नाखूनों को मुंह से कुतरता I
कभी लेट कर बेचारा ,
अपलक सूने गगन को निहारता I
कभी उत्सुकता से वह अखबारों के पन्ने पलटता,
कभी रात भर बेचारा करवटों से करवटें बदलता I
कभी घंटों बैठकर,
वह अपनी ठुड्डी को सहलाता I
कभी ठुड्डी को उंगली पर टिका कर,
विचार मग्न हो जाता I
उस शख्स की अजीब हरकतें देखकर ,
सोचने लगा मैं भी ,
आखिर इसे हो क्या गया है ?
बाद में मालूम पड़ा ,
भारत का वह बेचारा भविष्य
इस वर्ष ग्रेजुएट हो गया हैI -----
दीपक जुनेजा
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