यादों के सहारे जीने वाले ऐ मानुष,
कल्पनाओं में ही तू भटक जाएगा I
कुछ कर जल्दी कर वरना,
तेरा समय सपने देखने में ही निकल जाएगा I
तुझे बहुत फक्र है उन यादों पर,
जो तुझे दिन प्रतिदिन रुलाती है I
कभी चेहरे पर अनायास मुस्कान,
तो कभी आंखों से आंसू टपका जाती है I
यादों को ही जिंदगी बनाने वाले ऐ मानुष,
जिंदगी तेरे लिए खिलौना बन जाएगी I
जिंदगी को सोच समझ,
वरना यह तो अविरल गुजरती जाएगी I
तुझे बहुत गुमान है उन यादों पर,
जो तुझे भूतकाल में ले जाती है I
बीते हुए सुख को दुख की चादर ओढ़ा,
तुझे और दुखी कर जाती है I
यादों के पेड़ो पर लटकने वाले ऐ मानुष,
जिंदगी बहुत हसीन बन जाएगी I
समय रहते तो छोड़ दे यादों की डाली को,
वरना नीचे खाई गहरी होती जाएगीI दीपक जुनेजा
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