दस्तक दी हमने,
जवानी की दहलीज पर,
चूमकर छोड़ने पड़े,
हमें बचपन के प्यारे अधर,
भूलना पड़ा हमें,
उस उल्लास को,
उस चुलबुलाहट को,
उस बेफिक्र हँसी को,
जो हमारा बचपन था I
क्योंकि यह जवानी होती है,
रहित इन सबसे,
उल्लास का स्थान पाया है,
गमों की उस श्रृंखला ने,
जो अपना अंत प्रकट नहीं होने देती,
चुलबुलाहट की जगह ली है,
उस सुगबुगाहट ने,
जो दिल में ज्वार भाटे की तरह उफनती हैI
बेफिक्र हंसी का स्थान लिया है,
चिंता छुपाती उस हँसी ने,
जो टीवी में विज्ञापन की तरह उपजती है,
इन सभी परिवर्तनों का ही नाम,
शायद जवानी है I
दीपक जुनेजा
No comments:
Post a Comment