पुनः लौट आई है,
जेठ की वो तपती दोपहर,
शायद तुम्हें याद होगा,
जब तुमने और मैंने,
अपनी छतों पर खड़े होकर,
एक ऐसी ही दोपहर,
लगाई थी एक शर्त,
कि कौन किस के लिए खड़े हो सकता है,
नंगे पांव देरी तक,
तुम्हें यह भी याद होगा,
ढक लिया था तुमने अपने चेहरे को,
धूल भरे गुबारों से बचाने के लिए,
और उठा लिया था अपने पंजों को,
जलने से बचाने के लिए,
तब मैं ही हार गया था,
तुम्हारे प्यार के आगेI
और आज जब तुमने थाम लिया है,
हाथ किसी और का,
मैं खड़ा हूं छत के उसी स्थान पर,
ढूंढ रहा हूँ,
धूल भरे गुबारों में,
प्यार और वफ़ा नाम के लब्ज,
और हँस रहा हूं,
अपनी संपूर्ण हार,
और तुम्हारी हारी हुई जीत परI
दीपक जुनेजा
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