जिंदगी में औरों की तरह,
बनाई थी मैंने भी,
सपनों की एक धरती,
और बनाया था मैंने भी,
उस पर इच्छाओं का एक महल,
पर एक दिन ऐसा भूकंप आया,
इच्छाओं का जोर नहीं चल पाया,
सारा का सारा महल,
ताश के पत्तों की तरह डगमगाया,
पर अफसोस नहीं आया,
कोई मुझे बचाने,
ना कोई रिश्तेदार,
ना ही कोई मित्र,
किसी तरह की कोई राहत दिलाने,
लग पड़े ठहाके लगाने,
जब जिम्मेदारियों का कफन ओढाए,
मजबूरियां उठाऐ ले जा रही थी,
जनाजा,
मेरे लक्ष्यों, सपनों और अरमानों काI
दीपक जुनेजा
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