Saturday, 5 June 2021

#3 मैं

 जिंदगी पाकर भी,

मरता रहा हूं मैं I

बचपन को किलकारियों से,

बेशक भिगोता रहा हूं मैं I

जवानी को जिम्मेदारियों से,

निचोता रहा हूं मैं I

बुढ़ापे को बीमारियों से, 

धकोता रहा हूं मैं I

सुख-दुख के सागर में, 

गोते लगाता रहा हूं मैं I

हंसी के पीछे दबे  इन आंसुओं को, 

चुपके से पीता रहा हूँ मैं I

 मौत की दहलीज पर खड़ा, 

जीवन से बतियाता रहा हूं मैं I

इसके आगे यारों क्या कहूं आपसे, 

जीवन की इस माला को ,

आंसुओं से पिरोता रहा मैं I                        दीपक जुनेजा  

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