जिंदगी पाकर भी,
मरता रहा हूं मैं I
बचपन को किलकारियों से,
बेशक भिगोता रहा हूं मैं I
जवानी को जिम्मेदारियों से,
निचोता रहा हूं मैं I
बुढ़ापे को बीमारियों से,
धकोता रहा हूं मैं I
सुख-दुख के सागर में,
गोते लगाता रहा हूं मैं I
हंसी के पीछे दबे इन आंसुओं को,
चुपके से पीता रहा हूँ मैं I
मौत की दहलीज पर खड़ा,
जीवन से बतियाता रहा हूं मैं I
इसके आगे यारों क्या कहूं आपसे,
जीवन की इस माला को ,
आंसुओं से पिरोता रहा मैं I दीपक जुनेजा
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