Friday, 11 June 2021

# 22 ऐसा कभी सोचा भी ना था (यह कविता मेरे परम मित्र स्वर्गीय श्री राजेंद्र कुमार जाटोलिया जी को समर्पित है जिनका कोरोना की वजह से आकस्मिक देहावसान हो गया था )


 

सुमधुर व्यवहार,
सब का चहेता,
एक ऐसा सागर,
जो सभी के गमों को समेट,
अपनी गहराइयों में,
मुस्कुराहट की हिलोरें देता था
सूख जाएगा एक दिन
इतनी जल्दी
ऐसा कभी सोचा भी ना था।

वो नेक परिंदा,
जो था हर किसी की,
मदद के लिये आतुर,
घिर गया तूफानों में
बोला जरूर आऊँगा
चाहे लग जाए कितना भी समय
लौट के घर ना आएगा
ऐसा कभी सोचा भी ना था।

शौक है शब्दों के दोलन का
पर दर्द और आंसुओं से भरी कलम
तुम्हारे लिये चलेगी एक दिन
ऐसा कभी सोचा भी ना था।

काश होती समय की लगाम
हम सभी दोस्तों के पास
छीन लाते तुम्हें अपने पास
हो जाएंगे सब इतने असहाय
ऐसा कभी सोचा भी ना था।
                                        दीपक जुनेजा 

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