सोचता हूँ ,
तुम्हारे साथ भी,
थोड़ा सा,
वाद विवाद कर लूँ I
पडौस में तो बहुत देखा,
जरा अपने गिरेबान में भी झाँक लूँ I
पर तुम्हारे ही भटकाव ने,
मुझे बांध डाला है I
दोषी सिर्फ तुम ही हो,
तुम्ही ने सदा वार्तालाप डाला है I
तुम्हारे ही कारण मैं ऊंचा नहीं उठ पाता,
दूसरों में अवगुणों का सागर,
अपने में तो गागर भी नजर नहीं आताI
क्रोधित होकर सोचता हूं मैं,
काश तुम पर नियंत्रण रख पाता,
हाँ मेरे मन काश ............. दीपक जुनेजा
No comments:
Post a Comment