मरता है इंसान जब,
लोग रोते हैं फूट-फूटकर,
या करते हैं नाटक रोने का,
एक अजीब सी लय में,
यह तो खुदा ही जाने,
पर निश्चित है एक बात,
रोता जरूर होगा वह मनुज,
जो देख रहा है मर कर अपनी दशा,
चाहे यह दुनिया माने या ना माने I
अह्यसानों की यह प्रक्रिया शुरू होती है तब,
जब लोग करते हैं इंतजाम,
उसे कंधे पर उठाने का,
करते हैं इकट्थी लकड़ी ,
तथा अन्य सामान जलाने का,
उसे ले जाकर रख देते हैं,
इस धरती मां की छाती परI
बेटे बनाते हैं इंसान के लिए,
उसकी अंतिम सज्जा,
दूसरे लोग बैठ जाते हैं,
शुरू करते हैं फूँकनी,
बीड़ियाँ और सिगरेट,
किसी की अंतिम विदाई के समय भी,
नहीं मिटती लोगों की झक झक,
उस ग़मगीन माहौल में भी,
चालू रहती है ये गप्पे और बक बकI
फिर उठते हैं बेटे,
लगाते हैं आग चिता में,
फिर आते हैं लोग जलाकर,
फिर नहाते हैं साबुन लगाकर,
फिर तैयार होते हैं इत्र लगाकर,
होती हैं बातें राजनीति की ,
होती हैं बातें खेलों की ,
पर उस मरने वाले को,
यह संसार याद नहीं रख पाता है,
सच है दुनिया वालों यह संसार तो,
आदमी को मरते ही भूल जाता है I दीपक जुनेजा
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