Saturday, 5 June 2021

#8 बचपन

 काश मैं चला जाऊँ,

 उस अवस्था में ,

बचपन की ,

 जिसमें मां बहलाए ,

मुझे पालना झुलाये, 

 पापा की गोद से खींच कर, 

मुझे सीने से लगाए,

 दीदी दूर से ही चिल्लाए,

 राजा भैया कह कर बुलाए, 

देखकर शरारतें मेरी, 

सभी खुश हो जाएँ, 

 मुझे नफरत है इस अवस्था से, 

इसलिए नहीं कि मुझ पर आया है, 

जिम्मेदारियों का पहाड़, 

बल्कि इसलिए कि, 

अब यहां कोई भी नहीं करता प्यार मुझे, 

पापा है मुझ से बेखबर, 

मम्मी ने छोड़ा अपने हाल पर, 

दीदी गई हैं ससुराल, 

और यह पालना ?

यह है तो यहीं, 

पर उड़ा रहा है मुझ बेवकूफ की हँसीI      दीपक जुनेजा 

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