Saturday, 12 June 2021

#25 ये जहर, वो जहर



 सावधान !

 ना जाना बाहर,

 पता नहीं कौन लिए घूम रहा है,

 जहर तुम्हारे लिए,

 एक छूटी साँस और अदृश्य जहर,

सीधा तुम्हारी सांसों मेंI

 कहते हैं आया है चमगादड़ों से,

 और पता भी नहीं चलता, जहर पान  करने वाले को,

 कभी-कभी तो सांस टूट जाने तक भीI

 जहर तो जहर है, 

इंसान तो  उगलता ही आ रहा है,

 एक दूसरे के खिलाफ,

 धर्म जाति और रंग के नाम पर,

कभी पीठ पीछे, कभी सामने से,

 ये  जहर सुनाई देता है,

 अक्सर आते जातेI 

और वो  जहर सिर्फ दिखाई देता है,

 थोड़ा समय गुजर जाने के बादI 

पर यह जहर है ज्यादा जहरीला उस जहर से,

 क्योंकि वह जहर तो मिट जाएगा, 

एक दिन खुद ब खुदI

 पर यह जहर तो मारता ही रहेगा, 

आजीवन लोगों को, 

अनवरत अनिर्बाध और वैक्सीन रहितI

                                                 दीपक जुनेजा 

                                               Photo courtesy internet

Friday, 11 June 2021

#24 ये चीथड़े

 उड़ चले ये चीथड़े,

 शहर से गांव की ओर

 मैले कुचैले,डरे डरे से,

 भुखमरी के गर्म थपेड़ों के साथI

 कभी खुद लुढ़कते, 

कभी अटक जाते, 

किसी चलते वाहन की ट्रॉली परI

 तो कभी उसी वाहन तले कुचल दिए जाते, 

जलते सूरज ने इन्हें तपा डाला,

 तो कहीं लालची चूहों ने कुतर डालाI

 शहरी शेरवानी ने छोड़ दिया साथ इनका,

 अब जरूरत ना रही इनकी, 

सो उड़ चले इस सोच के साथ,

कि जैसे तैसे गांव पहुंचकर,

 वो चिपक जाएंगे, 

अपने ही घर के,

 पुराने फटे शर्ट में किसी पैबंद की तरहI

                                                     दीपक जुनेजा 

                                            #Photo courtesy internet

#23 एक माँ की व्यथा


 जी तो बहुत चाहता है,

 तुझे बाहों में भर के चूम लूँ,

 गले से लगाकर,

 गोद में बिठाकर,

 खाना खिलाऊँ अपने हाथों से I

तेरी किलकारियां आज भी बहुत सुहाती है,

 तेरी तोतली जुबान पर दिल उमड़ पड़ता है,

 काश तुझे सीने से लगा पाती I

 इतनी दूर से तुझे मेरे लिए रोता देख, 

मेरा भी दिल रो पड़ता है,

 काश तुझे चुप करा पाती I

 माफ कर देना बेटा मजबूर हूँ, 

 तेरी सेहत के लिए, 

अपने देश की सेहत के लिए, 

समझने की कोशिश करो बेटा,

 देश संकट में है I

तुम्हारी मां लड़ रही है एक जंग,

 अस्पताल से कोरोना योद्धा  बन कर, 

मत रो बेटा,

 जल्द ही आएगा वो दिन, 

जब ये काले बादल छंट जाएंगे, 

और मैं लौट आऊंगी घर, 

कोई योद्धा नहीं,

बल्कि तुम्हारी अपनी मां बनकरI

                                       दीपक जुनेजा 

                                      #Photo courtesy internet

# 22 ऐसा कभी सोचा भी ना था (यह कविता मेरे परम मित्र स्वर्गीय श्री राजेंद्र कुमार जाटोलिया जी को समर्पित है जिनका कोरोना की वजह से आकस्मिक देहावसान हो गया था )


 

सुमधुर व्यवहार,
सब का चहेता,
एक ऐसा सागर,
जो सभी के गमों को समेट,
अपनी गहराइयों में,
मुस्कुराहट की हिलोरें देता था
सूख जाएगा एक दिन
इतनी जल्दी
ऐसा कभी सोचा भी ना था।

वो नेक परिंदा,
जो था हर किसी की,
मदद के लिये आतुर,
घिर गया तूफानों में
बोला जरूर आऊँगा
चाहे लग जाए कितना भी समय
लौट के घर ना आएगा
ऐसा कभी सोचा भी ना था।

शौक है शब्दों के दोलन का
पर दर्द और आंसुओं से भरी कलम
तुम्हारे लिये चलेगी एक दिन
ऐसा कभी सोचा भी ना था।

काश होती समय की लगाम
हम सभी दोस्तों के पास
छीन लाते तुम्हें अपने पास
हो जाएंगे सब इतने असहाय
ऐसा कभी सोचा भी ना था।
                                        दीपक जुनेजा 

Tuesday, 8 June 2021

#21 लॉकडाउन

 एक अदृश्य दुश्मन,

 और चल पड़ा जैसे,

 अनसुने शब्दों का एक अनिमंत्रित कारवाँ,

 बहुत जरूरी थी बारी 'लॉक डाउन' की,

 दबाने को इस दुष्ट 'वायरस' की किलकारी, 

और आते ही लोग इसके, 

'सैनिटाइज' हो गए. 

रिश्ते 'क्वारंटाइन' हो गए, 

और आपसी प्रेम पड़ा है, 

किसी कोने में 'आइसोलेट' होकर,

 एक दूसरे पर विश्वास बहुत 'क्रिटिकल' है,

 कर रहा है संघर्ष अपना अस्तित्व बचाने के लिए,

'वैरिएंट' लोग बदल रहे हैं या 'वायरस'I

इन्सानियत के 'वेंटीलेटर' तक पहुँचने से पहले,  

 काश जल्द हो जाए जीरो 'ऑक्सीजन लेवल'

इस 'डेडली'  दुश्मन का I

                                    दीपक जुनेजा 

#20 अपराध

 अपराध की खबर,

 आजकल नहीं रही,

 विषय प्रायश्चित का,

 सबक और डर का,

 हर घर में अलग है जवाब 

आजकल इसकी  दस्तक का,

 कहीं क्षणिक संवेदना और फिर विस्मरण का 

कहीं हंसी ठिठोली,

शेखी और राजनीति का,

 मोमबत्ती जुलूस की सेल्फी का,

 और किसी को तो आता है आईडिया,

कुछ तूफानी करने का,

 खुद करके देखने का,

और  फिर होता है एक नया अपराध, 

और जन्म लेती  है एक और ब्रेकिंग न्यूज़I

                                                        दीपक जुनेजा 

Monday, 7 June 2021

#19 भूकंप

 जिंदगी में औरों की तरह, 

बनाई थी मैंने भी, 

सपनों की एक धरती, 

 और बनाया था मैंने भी, 

उस पर इच्छाओं का एक महल, 

पर एक दिन ऐसा भूकंप आया, 

इच्छाओं का जोर नहीं चल पाया, 

 सारा का सारा महल, 

ताश के पत्तों की तरह डगमगाया,

 पर अफसोस नहीं आया, 

कोई मुझे बचाने,

 ना कोई रिश्तेदार, 

ना ही कोई मित्र, 

किसी तरह की कोई राहत दिलाने,

 लग पड़े ठहाके लगाने, 

 जब जिम्मेदारियों का कफन ओढाए, 

मजबूरियां उठाऐ ले जा रही थी, 

जनाजा, 

मेरे लक्ष्यों, सपनों और अरमानों काI

                                                           दीपक जुनेजा